“हलाला” का यह कैसा justification?

समय के साथ सोच, व्यवहार, नैतिकता, सभी बदलते हैं। निश्चित रूप से परिभाषाएँ भी बदलती हैं और उन definitions को अपनी सहूलियत के हिसाब से explain भी किया जाता है। “हलाला” एक ऐसी कुप्रथा है जिसे मर्द कितना भी justify कर ले, व्यावहारिक दृष्टिकोण से उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसे सही ठहराने के लिए क़ुरान के आयतों को अनेक ढंग से explain  गया है जिसमें हलाला को अपने मूल रूप से बिलकुल अलग दर्शाया गया है।
      इससे पहले कि क़ुरान में हलाला के provisions पर बात करें , मैं Facebook के एक video post को चर्चा में लाना चाहता हूँ। video शाज़िया नवाज़ के द्वारा निर्मित है और उन्ही के द्वारा post भी किया गया है। शाज़िया पाकिस्तान की हैं। वहीं उनकी पढ़ाई लिखाई हुई और अब वह अमेरिका में रहती हैं। पेशे से डॉक्टर हैं और निश्चित रूप से काफ़ी आधुनिकता (modern) हैं। इस video post में उन्होंने हलाला पर अपना विचार व्यक्त किया है। वह कहती हैं कि  हलाला दरअसल औरतों पर ज़ुल्म नहीं बल्कि मज़ा करने का एक मौक़ा है। इसे उन्होंने justify करते हुए कहा है कि हलाला उस मर्द के लिए सज़ा है जिसने अपनी पत्नी को तलाक़ दिया था। शाज़िया के अनुसार यह one night stand जैसा रोमांचकारी और एक fantasy को पूरा करने जैसी बात है। ख़ैर, शाज़िया के लिए हलाला शायद एक sexual fantasy  हो सकती है, लेकिन क्या वैसे समाज में जहाँ महिलाओं की सोच भी मर्दों से guided है, एसे  fantasy मात्र से अपराधबोध होना सामान्य बात नहीं होगी ? यहाँ जिस समाज की बात मैं कर रहा हूँ वह ना सिर्फ़ भारत बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। 
इस्लाम में हलाला का मतलब होता है कि जब एक तलाक़शुदा औरत अपनी मर्ज़ी से किसी दूसरे मर्द से शादी कर ले और अगर संयोग से दूसरा पति भी उसे तलाक़ दे दे या मर जाए , तब इस परिस्थिति में वह औरत आपने पहले पति से निकाह कर सकती है। होता यह है कि लोग काज़ियों और मौलवियों के साथ मिलकर इस provision को अमल में लाते हैं जो पूरी तरह से artificial है।जब कोई मर्द अपनी पत्नी को तलाक़ दे देता है और फिर उसी से शादी करना चाहता है तो उस महिला को पहले किसी दूसरे मर्द के साथ शादी करनी होती है और फिर तलाक़ दिलवा कर पूर्व पति से निकाह होता है।जबकि होना यह चाहिए कि पूरी प्रक्रिया इत्तफ़ाक़न हो ना कि साज़िशन। हलाला होने की पूरी प्रक्रिया “हुल्ला” कहलाती है। अब ज़रा क़ुरान के मूल provision पर ध्यान दें । सूरए बक़रह की  आयत संख्या 229 के अनुसार — 
                 हर पुरुष के लिए अपनी पहली पत्नी के पास लौटने और तलाक़ देने का अधिकार सिर्फ़ दो बार है।मतलब यह कि कोई पति सिर्फ़ दो बार ही तलाक़ देने और उससे “रुजू” यानी उसके पास वापस जाने का अधिकार रखता है और यदि तीसरी बार ऐसा होता है तो सूरए बक़रह की आयत संख्या 230, 231और 232 के अनुसार हलाला की प्रक्रिया को करने का प्रावधान है जो पूरी तरह इत्तफ़ाक़न हो।
बहरहाल, क़ुरान के provisions की जिस तरह से धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं उसे तो ख़ुद मुस्लिम समाज ही ठीक कर सकता है। हो सकता है कि आधुनिक सोच के कारण कई महिलाएँ भी शाज़िया नवाज़ जैसी सोच रखती हों, जिसके लिए वे स्वतंत्र भी हैं, लेकिन किसी भी justification में एक मूल धार्मिक ग्रंथ के विचारों के ठीक उलट विचार रखना कितना सही है?
 

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