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कितनी कठिन है नीतीश की राह ?

कहते हैं राजनीति और प्रशासन में हर समय और हर किसी को खुश नहीं रखा जा सकता। कुछ ऐसा ही नज़ारा है बिहार में। राज्य में विधान सभा चुनाव होने को एक वर्ष से भी कम समय रह गया है और कई ऐसे सवाल हैं जो सत्ताधारी पार्टियों को फ़िर से सत्ता में काबिज होने पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। इसमें भी शक नहीं कि वर्तमान सरकार ने आशातीत कार्य किए हैं, लेकिन जब हम सरकारी आँकड़ों से उसकी तुलना करते हैं, तो आम जनता; जहाँ आज भी करीब 40% लोग निरक्षर हैं, को समझाना सरकार के लिए कठिन होगा। इसके अलावा जदयू और भाजपा के आंतरिक कलह भी अब जगजाहिर हैं। विकास की बात करें तो वर्तमान सरकार के पास आँकड़ों की कमी नहीं है, पर यह भी सच है कि यह कई बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में अक्षम रही है। भूख से होने वाली मौतें, नरेगा में भ्रष्टाचार और कई ऐसी अनियमितताएं सरकार को कटघरे में ला खडी करती हैं। वहीं शहरी क्षेत्रों में हुए भौतिक विकास यानी सडक, पानी, बिजली आदि में सुधार सरकार की उपलब्धि कही जा सकती है। लेकिन आज भी 70% जनता गांवों में ही रहती है और वोट डालने का प्रतिशत भी उन्हीं का ज्यादा होता है। शायद यही कारण है कि वर्तमान सर...

वर्जिन प्यार : ऐसा होता है क्या ?

  पता नहीं हिंदी में वर्जिनिटी का सबसे करीबी शब्द कौन सा है? क्योंकि इसके लिए जब हम अविवाहित, अविवाहिता, कुंवारे या कुंवारी शब्द का प्रयोग करते हैं, तो वह भारत या पूरे दक्षिण एशिया में तो मान्य होगा, पर इन शब्दों को चीड़-फाड़ कर देखें तो दोनों के अर्थ काफी दूर हो जाते हैं. लेकिन इन सभी शब्दों का एक कॉमन फैक्टर है; प्यार. हाँ, प्यार के कारण अनेक हो सकते हैं.                                                             करीब दो साल पहले काफी चर्चित प्रो. मटुकनाथ का मैं इंटरव्यू कर रहा था. पहले से ही मैंने सोच रखा था कि आज मैं उनसे उगलवा के ही रहूँगा कि इस उम्र में उनके प्रेम के पीछे कहीं-न-कहीं से...

कुछ तो शर्म करो यार.....

नीतीश जी की सरकार चार वर्ष पूरी कर रही थी और और इस वर्ष भी पूरे ताम-झाम के साथ रिपोर्ट-कार्ड पेश करने की रस्म अदा होनी थी. जश्न में चार चाँद लगाने के लिए राज्य के सभी बड़े-बड़े अखबारों को विज्ञापनों से सजाया गया. विज्ञापन भी इस तरह कि प्रत्येक अखबार को पांच-छह पन्नो का परिशिष्ट लगाना पड़ा. गत २४ नवम्बर का अखबार प्रशस्ति-पत्र ही था. हद तो तब हो गयी जब एक जाने-माने अखबार के कोलकाता अवस्थित मुख्यालय को सारा विज्ञापन चला गया और उसके पटना संस्करण को एक भी हाथ नहीं लगा.                                                    अब ज़रा मुख्यमंत्री जी के प्रेस कांफ्रेंस पर भी नज़र डालें. स्वागत भाषण में उप-मुख्यमंत्री ने बिहार से मजदूरों के पलायन में आयी कमी को दिखाने के लिए क्या ज़बरदस्त आंकड़ा दिया. बकौल उनके २००६-०७ में ८८५ करोड़ रुपये मानी आर्डर के...